सुप्रीम कोर्ट ने 2 दिसंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को शादी के समय दिए गए मेहर, गहने, नकद और अन्य उपहारों को पूर्व पति से वापस पाने का अधिकार दिया गया है। यह फैसला मुस्लिम महिलाओं (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत आता है, जो महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है। जस्टिस संजय करोल और एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने कलकत्ता हाईकोर्ट के 2022 और 2024 के फैसलों को पलट दिया, जो महिलाओं के दावों को खारिज कर चुके थे
मामला पश्चिम बंगाल की रौसनारा बेगम का है, जिनकी 2005 में शादी हुई थी। 2009 में अलगाव और 2011 में तलाक के बाद, उन्होंने शादी के रजिस्टर (कबीलनामा) में दर्ज 7 लाख रुपये नकद और 30 भोरी सोने के गहनों की वसूली की मांग की। ये उपहार उनके पिता ने दूल्हे को दिए थे। ट्रायल कोर्ट ने महिलाओं के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी का हवाला देकर खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी के रजिस्ट्रार की गवाही और दस्तावेज पर्याप्त हैं, और हाईकोर्ट ने इसे गलत तरीके से सिविल विवाद माना।
यह फैसला महिलाओं को शादी के समय रिश्तेदारों, मित्रों या पति पक्ष से मिली संपत्ति पर अधिकार देता है, जिसमें फ्रिज, टीवी जैसे घरेलू सामान भी शामिल हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि 1986 अधिनियम का उद्देश्य तलाक के बाद महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा, समानता और स्वायत्तता से जुड़ा है।
