1980 के दशक के अंत में भारत की राजनीति में बोफोर्स घोटाला एक तूफान की तरह आया। स्वीडिश कंपनी बोफोर्स से 155 एमएम तोपों की खरीद में 64 करोड़ रुपये के कथित कमीशन का मामला सामने आया। तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह ने इसकी जांच शुरू की, जो सीधे प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कुर्सी पर सवार हो गई।
1987 में वित्त मंत्री से रक्षा मंत्रालय संभालते हुए वीपी सिंह को बोफोर्स फाइलों में गड़बड़ी दिखी। राजीव गांधी सरकार ने जांच को दबाने की कोशिश की, लेकिन सिंह ने हार नहीं मानी। अप्रैल 1987 में उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया, जिसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का प्रतीक माना गया
1989 के लोकसभा चुनावों में बोफोर्स मुद्दा प्रमुख रहा। वीपी सिंह के नेतृत्व वाली गठबंधन ने 405 सीटों वाली कांग्रेस को 197 पर सिमटा दिया। राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गए, और सिंह प्रधानमंत्री बने। यह जीत सिर्फ बोफोर्स की नहीं, बल्कि ईमानदारी की जीत थी।
मांडा रियासत के राजकुमार विश्वनाथ प्रताप सिंह को ‘राजा साहब’ कहना उनकी विनम्रता का प्रतीक था। बोफोर्स के अलावा मंडल कमीशन लागू कर उन्होंने OBC आरक्षण को हकीकत दिया, जो सामाजिक न्याय की क्रांति लाया
